कबीरदास जी ने सच ही कहा है, “साईं इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय | मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाए || अर्थात वे ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि हे ईश्वर ! मुझे केवल इतना ही धन, जल और अन्न देना जिससे मैं अपने परिवार का पालन कर सकूँ और मेरे द्वार पर आया कोई मेहमान भी भूखा ना जाए |

आज संसार को इस सोच की अधिक ज़रुरत है | जहाँ देखो वहाँ एक-दूसरे से आगे निकलने, अधिक संपत्ति अर्जित करने की मानो होड़ लगी हुई है | भले ही किसी के पास अपार धन-दौलत हो, वह कितना भी अमीर हो, दिल तथा दिमाग से वह गरीब ही होता जा रहा है | निजी स्वार्थ हेतु इंसानियत की छवि धूसर होती जा रही है | औरों के बारे में सोचने तथा उनके कष्टों को कम करने का प्रयास करने जैसे कर्तव्यों से मुँह मोड़ा जा रहा है | यह आज के जीवन की सच्चाई है | इस कारण दुनिया में चारों ओर असंतुष्टि का जाल फैलता जा रहा है और इसमें फँसता जा रहा है बेचारा आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा इंसान | केवलअपने तथा अपनों के बारे में सोचने और अधिकाधिक लालची वृत्ति ही अनेक समस्याओं की जड़ है | इससे ऊँच-नीच का भेदभाव, स्वेच्छाचारिता आदि दुष्प्रवृतियों को बढ़ावा मिलता है | शुरुआत में एक ज़रूरत या आवश्यकता लगनेवाली यह चीज़ धीरे-धीरे आदत और फिर स्वभाव बन जाती है |

हमें इस प्रवृत्ति को बदलना होगा | प्रकृति से हम बहुत-सी बातें सीखते हैं | बादल भी अपने पास अधिक जल का संचय नहीं करते | वे भी बरसते हैं | पशु-पक्षी भी आनेवाले कल के बारे में सोचकर अन्न को संग्रहित नहीं करते | उसी प्रकार इंसान को भी संतुष्ट रहना चाहिए |